काका हाथरसी की हास्य कविता |

hasya vyangya kavita in hindi by kaka hathrashi

हास्य व्यंग्य कविता | अमंगल आचरण | काका हाथरसी

मात शारदे नतमस्तक हो, काका कवि करता यह प्रेयर
ऐसी भीषण चले चकल्लस, भागें श्रोता टूटें चेयर

वाक् युद्ध के साथ-साथ हो, गुत्थमगुत्था हातापाई
फूट जायें दो चार खोपड़ी, टूट जायें दस बीस कलाई

आज शनिश्चर का शासन है, मंगल चरण नहीं धर सकता
तो फिर तुम्हीं बताओ कैसे, मैं मंगलाचरण कर सकता

इस कलियुग के लिये एक आचार संहिता नई बना दो
कुछ सुझाव लाया हूँ देवी, इनपर अपनी मुहर लगा दो

सर्वोत्तम वह संस्था जिसमें पार्टीबंदी और फूट हो
कुशल राजनीतिज्ञ वही, जिसकी रग–रग में कपट झूठ हो

वह कैसा कवि जिसने अब तक, कोई कविता नहीं चुराई
भोंदू है वह अफसर जिसने, रिश्वत की हाँडी न पकाई

रिश्वत देने में शरमाए, वह सरमाएदार नहीं है
रिश्वत लेने में शरमाए, उसमें शिष्टाचार नहीं है

वह क्या नेता बन सकता है, जो चुनाव में कभी न हारे
क्या डाक्टर वह महीने भर में, पन्द्रह बीस मरीज़ न मारे

कलाकार वह ऊँचा है जो, बना सके हस्ताक्षर जाली
इम्तहान में नकल कर सके, वही छात्र है प्रतिभाशाली

जिसकी मुठ्ठी में सत्ता है, पारब्रह्म साकार वही है
प्रजा पिसे जिसके शासन में, प्रजातंत्र सरकार वही है

मँहगाई से पीड़ित कार्मचारियों को करने दो क्रंदन
बड़े वड़े भ्रष्टाचारी हैं, उनका करवाओ अभिनंदन

करें प्रदर्शन जो हड़ताली, उनपर लाठीचार्ज करा दो
लाठी से भी नहीं मरें तो, चूको मत, गोली चलवा दो

लेखक से लेखक टकराए, कवि को कवि से हूट करा दो
सभापति से आज्ञा लेकर, संयोजक को शूट करा दो

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हास्य व्यंग्य कविता |कालिज स्टूडैंट | best hindi hasya vyangya kavita

फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।

पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।
फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।

प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें ‘काका कवि’ राय¸ भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह ‘बिगड़े दिल नेता।’

हास्य व्यंग्य कविता | नाम बड़े दर्शन छोटे | vyangya kavita in hindi by kaka hathrasi

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर?
नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और।
शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने,
बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने।
कहं ‘काका’ कवि, दयारामजी मारे मच्छर,
विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर।

मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप,
श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप।
जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट हैण्ट में-
ज्ञानचंद छ्ह बार फेल हो गए टैंथ में।
कहं ‘काका’ ज्वालाप्रसादजी बिल्कुल ठंडे,
पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे।

देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट,
सेठ छदम्मीलाल के मील चल रहे आठ।
मील चल रहे आठ, कर्म के मिटें न लेखे,
धनीरामजी हमने प्राय: निर्धन देखे।
कहं ‘काका’ कवि, दूल्हेराम मर गए कंवारे,
बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बिचारे।

दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल,
मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल।
रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं,
ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भोंक रहे हैं।
‘काका’ छ्ह फिट लंबे छोटूराम बनाए,
नाम दिगम्बरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए।

पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल,
बिना सूंड के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल।
मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सम्हारी-
बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरिधारी।
कहं ‘काका’ कविराय, करें लाखों का सट्टा,
नाम हवेलीराम किराए का है अट्टा।

दूर युद्ध से भागते, नाम रखा रणधीर,
भागचंद की आज तक सोई है तकदीर।
सोई है तकदीर, बहुत-से देखे-भाले,
निकले प्रिय सुखदेव सभी, दु:ख देने वाले।
कहं ‘काका’ कविराय, आंकड़े बिल्कुल सच्चे,
बालकराम ब्रह्मचारी के बारह बच्चे।

चतुरसेन बुद्धू मिले, बुद्धसेन निर्बुद्ध,
श्री आनन्दीलालजी रहें सर्वदा क्रुद्ध।
रहें सर्वदा क्रुद्ध, मास्टर चक्कर खाते,
इंसानों को मुंशी, तोताराम पढ़ाते,
कहं ‘काका’, बलवीरसिंहजी लटे हुए हैं,
थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुए हैं।

बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल,
सूखे गंगारामजी, रूखे मक्खनलाल।
रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी-
निकले बेटा आसाराम निराशावादी।
कहं ‘काका’, कवि भीमसेन पिद्दी-से दिखते,
कविवर ‘दिनकर’ छायावादी कविता लिखते।

आकुल-व्याकुल दीखते शर्मा परमानंद,
कार्य अधूरा छोड़कर भागे पूरनचंद।
भागे पूरनचंद, अमरजी मरते देखे,
मिश्रीबाबू कड़वी बातें करते देखे।
कहं ‘काका’ भण्डारसिंहजी रोते-थोते,
बीत गया जीवन विनोद का रोते-धोते।

शीला जीजी लड़ रही, सरला करती शोर,
कुसुम, कमल, पुष्पा, सुमन निकलीं बड़ी कठोर।
निकलीं बड़ी कठोर, निर्मला मन की मैली
सुधा सहेली अमृतबाई सुनीं विषैली।
कहं ‘काका’ कवि, बाबू जी क्या देखा तुमने?
बल्ली जैसी मिस लल्ली देखी है हमने।

तेजपालजी मौथरे, मरियल-से मलखान,
लाला दानसहाय ने करी न कौड़ी दान।
करी न कौड़ी दान, बात अचरज की भाई,
वंशीधर ने जीवन-भर वंशी न बजाई।
कहं ‘काका’ कवि, फूलचंदनजी इतने भारी-
दर्शन करके कुर्सी टूट जाय बेचारी।

खट्टे-खारी-खुरखुरे मृदुलाजी के बैन,
मृगनैनी के देखिए चिलगोजा-से नैन।
चिलगोजा-से नैन, शांता करती दंगा,
नल पर न्हातीं गोदावरी, गोमती, गंगा।
कहं ‘काका’ कवि, लज्जावती दहाड़ रही है,
दर्शनदेवी लम्बा घूंघट काढ़ रही है।

कलीयुग में कैसे निभे पति-पत्नी का साथ,
चपलादेवी को मिले बाबू भोलानाथ।
बाबू भोलानाथ, कहां तक कहें कहानी,
पंडित रामचंद्र की पत्नी राधारानी।
‘काका’ लक्ष्मीनारायण की गृहणी रीता,
कृष्णचंद्र की वाइफ बनकर आई सीता।

अज्ञानी निकले निरे, पंडित ज्ञानीराम,
कौशल्या के पुत्र का रक्खा दशरथ नाम।
रक्खा दशरथ नाम, मेल क्या खुब मिलाया,
दूल्हा संतराम को आई दुलहिन माया।
‘काका’ कोई-कोई रिश्ता बड़ा निकम्मा-
पार्वतीदेवी है शिवशंकर की अम्मा।

पूंछ न आधी इंच भी, कहलाते हनुमान,
मिले न अर्जुनलाल के घर में तीर-कमान।
घर में तीर-कमान, बदी करता है नेका,
तीर्थराज ने कभी इलाहाबाद न देखा।
सत्यपाल ‘काका’ की रकम डकार चुके हैं,
विजयसिंह दस बार इलैक्शन हार चुके हैं।

सुखीरामजी अति दुखी, दुखीराम अलमस्त,
हिकमतराय हकीमजी रहें सदा अस्वस्थ।
रहें सदा अस्वस्थ, प्रभु की देखो माया,
प्रेमचंद में रत्ती-भर भी प्रेम न पाया।
कहं ‘काका’ जब व्रत-उपवासों के दिन आते,
त्यागी साहब, अन्न त्यागकार रिश्वत खाते।

रामराज के घाट पर आता जब भूचाल,
लुढ़क जायं श्री तख्तमल, बैठें घूरेलाल।
बैठें घूरेलाल, रंग किस्मत दिखलाती,
इतरसिंह के कपड़ों में भी बदबू आती।
कहं ‘काका’, गंभीरसिंह मुंह फाड़ रहे हैं,
महाराज लाला की गद्दी झाड़ रहे हैं।

दूधनाथजी पी रहे सपरेटा की चाय,
गुरू गोपालप्रसाद के घर में मिली न गाय।
घर में मिली न गाय, समझ लो असली कारण-
मक्खन छोड़ डालडा खाते बृजनारायण।
‘काका’, प्यारेलाल सदा गुर्राते देखे,
हरिश्चंद्रजी झूठे केस लड़ाते देखे।

रूपराम के रूप की निन्दा करते मित्र,
चकित रह गए देखकर कामराज का चित्र।
कामराज का चित्र, थक गए करके विनती,
यादराम को याद न होती सौ तक गिनती,
कहं ‘काका’ कविराय, बड़े निकले बेदर्दी,
भरतराम ने चरतराम पर नालिश कर दी।

नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?
किसी पार्टी के नहीं झंडाराम सदस्य।
झंडाराम सदस्य, भाग्य की मिटें न रेखा,
स्वर्णसिंह के हाथ कड़ा लोहे का देखा।
कहं ‘काका’, कंठस्थ करो, यह बड़े काम की,
माला पूरी हुई एक सौ आठ नाम की।

हास्य व्यंग्य कविता |मँहगाई |काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोल महँगाई से हो गया, जीवन डाँवाडोल जीवन डाँवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू कहँ ‘काका’ कवि, दूध-दही को तरसे बच्चे आठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे 
राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर ‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला कहँ ‘काका’ कवि, करके बंद धरम का काँटा लाला बोले-भागो, खत्म हो गया आटा

चंद्रयात्रा और नेता का धंधा | काका हाथरसी कविता  Kaka Hathrasi कविता

 ठाकुर ठर्रा सिंह से बोले आलमगीरपहुँच गये वो चाँद पर, मार लिया क्या तीर?मार लिया क्या तीर, लौट पृथ्वी पर आयेकिये करोड़ों ख़र्च, कंकड़ी मिट्टी लाये ‘काका’, इससे लाख गुना अच्छा नेता का धंधा बिना चाँद पर चढ़े, हजम कर जाता चंदा
‘ल्यूना-पन्द्रह’ उड़ गया, चन्द्र लोक की ओर । पहुँच गया लौटा नहीं मचा विश्व में शोर ॥मचा विश्व में शोर, सुन्दरी चीनी बाला । रहे चँद्रमा पर लेकर खरगोश निराला ॥उस गुड़िया की चटक-मटक पर भटक गया है ।अथवा ‘बुढ़िया के चरखे’ में अटक गया है ॥कहँ काका कवि, गया चाँद पर लेने मिट्टी । मिशन हो गया फैल हो गयी गायब सिट्टी ॥

पहुँच गए जब चाँद पर, एल्ड्रिन, आर्मस्ट्रोंग । शायर- कवियों की हुई काव्य कल्पना ‘रोंग’ ॥काव्य कल्पना ‘रोंग’, सुधाकर हमने जाने । कंकड़-पत्थर मिले, दूर के ढोल सुहाने ॥कहँ काका कविराय, खबर यह जिस दिन आई । सभी चन्द्रमुखियों पर घोर निरशा छाई ॥

पार्वती कहने लगीं, सुनिए भोलेनाथ !अब अच्छा लगता नहीं ‘चन्द्र’ आपके माथ ॥’चन्द्र’ आपके माथ, दया हमको आती है । बुद्धि आपकी तभी ‘ठस्स’ होती जाती है ॥धन्य अपोलो ! तुमने पोल खोल कर रख दी । काकीजी ने ‘करवाचौथ’ कैंसिल कर दी ॥

सुघड़ सुरीली सुन्दरी दिल पर मारे चोट । चमक चाँद से भी अधिक कर दे लोटम पोट ॥कर दे लोटम पोट, इसी से दिल बहलाएँ । चंदा जैसी चमकें, चन्द्रमुखी कहलाएँ ॥मेकप करते-करते आगे बढ़ जाती है । अधिक प्रशंसा करो चाँद पर चढ़ जाती है ॥

प्रथम बार जब चाँद पर पहुँचे दो इंसान । कंकड़ पत्थर देखकर लौट आए श्रीमान ॥लौट आए श्रीमान, खबर यह जिस दिन आई । सभी चन्द्रमुखियों पर घोर निरशा छाई ॥पोल खुली चन्दा की, परिचित हुआ ज़माना । कोई नहीं चाहती अब चन्द्रमुखी कहलाना ॥

वित्तमंत्री से मिले, काका कवि अनजान । प्रश्न किया क्या चाँद पर रहते हैं इंसान ॥रहते हैं इंसान, मारकर एक ठहाका । कहने लगे कि तुम बिलकुल बुद्धू हो काका ॥अगर वहाँ मानव रहते, हम चुप रह जाते । अब तक सौ दो सौ करोड़ कर्जा ले आते ॥

हास्य व्यंग्य कविता | Kaka Hathrasi  काका दोहावली |काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 मेरी भाव बाधा हरो, पूज्य बिहारीलाल दोहा बनकर सामने, दर्शन दो तत्काल।
अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज, ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज। 
अँखियाँ मादक रस-भरी, गज़ब गुलाबी होंठ,ऐसी तिय अति प्रिय लगे, ज्यों दावत में सोंठ।
अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट, मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट। 
अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख,ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख।
अंधकार में फेंक दी, इच्छा तोड़-मरोड़निष्कामी काका बने, कामकाज को छोड़। 
अंध धर्म विश्वास में, फँस जाता इंसान, निर्दोषों को मारकर, बन जाता हैवान। 
अंधा प्रेमी अक्ल से, काम नहीं कुछ लेय, प्रेम-नशे में गधी भी, परी दिखाई देय। 
अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद, देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंद।
अगर चुनावी वायदे, पूर्ण करे सरकार, इंतज़ार के मज़े सब, हो जाएँ बेकार। 
अगर फूल के साथ में, लगे न होते शूल, बिना बात ही छेड़ते, उनको नामाकूल। 
अगर मिले दुर्भाग्य से, भौंदू पति बेमेल, पत्नी का कर्त्तव्य है, डाले नाक नकेल। 
अगर ले लिया कर्ज कुछ, क्या है इसमें हर्ज़, यदि पहचानोगे उसे, माँगे पिछला क़र्ज़। 
अग्नि निकलती रगड़ से, जानत हैं सब कोय, दिल टकराए, इश्क की बिजली पैदा होय।
अच्छी लगती दूर से मटकाती जब नैन, बाँहों में आ जाए तब बोले कड़वे बैन।
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, चाचा मेरे कह गए, कर बेटा आराम।


अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, भाग्यवाद का स्वाद ले, धंधा काम हराम।
अति की बुरी कुरूपता, अति का भला न रूप, अति का भला न बरसना अति भली न धूप। 
अति की भली न दुश्मनी, अति का भला न प्यार तू तू मैं मैं जब हुई प्यार हुआ बेकार। 
अति की भली न बेरुखी, अति का भला न प्यारअति की भली न मिठाई, अति का भला न खार। 
अति की वर्षा भी बुरी, अति की भली न धूप, अति की बुरी कूरुपता, अति का भला न रूप। 
अधिक समय तक चल नहीं, सकता वह व्यापार, जिसमें साझीदार हों, लल्लू-पंजू यार।
अधिकारी के आप तब, बन सकते प्रिय पात्र काम छोड़ नित नियम से, पढ़िए, चमचा-शास्त्र।
अपना स्वारथ साधकर, जनता को दे कष्ट, भ्रष्ट आचरण करे जो वह नेता हो भ्रष्ट। 
अपनी आँख तरेर कर, जब बेलन दिखलाय, अंडा-डंडा गिर पड़ें, घर ठंडा हो जाय।
अपनी गलती नहिं दिखे, समझे खुद को ठीक, मोटे-मोटे झूठ को, पीस रहा बारीक।
अपनी ही करता रहे, सुने न दूजे तर्क, सभी तर्क हों व्यर्थ जब, मूरख करे कुतर्क|

हास्य व्यंग्य कविता | चोरी की रपट |काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 घूरे खाँ के घर हुई चोरी आधी रात ।कपड़े-बर्तन ले गए छोड़े तवा-परात ॥छोड़े तवा-परात, सुबह थाने को धाए ।क्या-क्या चीज़ गई हैं सबके नाम लिखाए ॥आँसू भर कर कहा – महरबानी यह कीजै ।तवा-परात बचे हैं इनको भी लिख लीजै ॥कोतवाल कहने लगा करके आँखें लाल ।उसको क्यों लिखवा रहा नहीं गया जो माल ॥नहीं गया जो माल, मियाँ मिमियाकर बोला ।मैंने अपना दिल हुज़ूर के आगे खोला ॥मुंशी जी का इंतजाम किस तरह करूँगा ।तवा-परात बेचकर ‘रपट लिखाई’ दूँगा ॥

शिक्षा-पद्धति |काका हाथरसी Kaka Hathrasi | हास्य व्यंग्य कविता

बाबू सर्विस ढूँढते, थक गए करके खोज ।अपढ श्रमिक को मिल रहे चालीस रुपये रोज़ ॥चालीस रुपये रोज़, इल्म को कूट रहे हैं ।ग्रेजुएट जी रेल और बस लूट रहे हैं ॥पकड़े जाँए तो शासन को देते गाली ।देख लाजिए शिक्षा-पद्धति की खुशहाली॥

क्षमा प्रार्थना | काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 मिला निमंत्रण आपका, धन्यवाद श्रीमान,किंतु हमारे हाल पर कुछ तो दीजे ध्यान।कुछ तो दीजे ध्यान, हुक्म काकी का ऐसा,बहुत कर चुके प्राप्त, प्रतिष्ठा-पदवी-पैसा।खबरदार, अब कवि सम्मेलन में मत जाओ,लिखो पुस्तकें, हास्य-व्यंग्य के फूल खिलाओ।

हास्य व्यंग्य कविता | मरने से क्या डरना | काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 नियम प्रकृति का अटल, मिटे न भाग्य लकीर।आया है सो जाएगा राजा रंक फ़कीर॥राजा रंक फ़कीर चलाओ जीवन नैय्या।मरना तो निश्चित है फिर क्या डरना भैय्या॥रोओ पीटो, किंतु मौत को रहम न आए।नहीं जाय, यमदूत ज़बरदस्ती ले जाए॥जो सच्चा इंसान है उसे देखिये आप।मरते दम तक वह कभी करे न पश्चाताप॥करे न पश्चाताप, ग़रीबी सहन करेगा।लेकिन अपने सत्यधर्म से नहीं हटेगा॥

अंत समय में ऐसा संत मोक्ष पद पाए।सत्यम शिवम सुन्दरम में वह लय हो जाए॥जीवन में और मौत में पल भर का है फ़र्क।हार गए सब ज्योतिषी फेल हो गए तर्क॥फेल हो गए तर्क, उम्र लम्बी बतलाई।हार्ट फेल हो गया दवा कुछ काम न आई॥जीवन और मौत में इतना फ़र्क जानिए।साँस चले जीवन, रुक जाए मौत मानिए॥

काका हाथरसी कविता
काका हाथरसी

क्या चमका मेरा भाग, सखे- काका हाथरसी

मैं एर्थक्लास में हुआ फ़ेल,
वे मिलीं पास मैट्रिक मुझको,
बस इसी बात पर बार-बार कर
देती हैं अनफिट मुझको
वे मीठी-मीठी दिलखुशाल
मैं बना नीम का साग, सखे!
क्या चमका मेरा भाग, सखे

वे दिल्ली की रहने वालीं…

वे दिल्ली की रहने वालीं,
मैं ठहरा देहाती धुर्रा,
उनके कमरे में जाता हूं,
देखें मुझको घुर्रा-घुर्रा।
वे गोरी-गोरी बगुला-सी,
मैं काला-काला काग सखे!
क्या चमका मेरा भाग, सखे

हास्य व्यंग्य | झूठ माहात्म्य | काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 झूठ बराबर तप नहीं, साँच बराबर पाप जाके हिरदे साँच है, बैठा-बैठा टाप बैठा-बैठा टाप, देख लो लाला झूठा ‘सत्यमेव जयते’ को दिखला रहा अँगूठा कहँ ‘काका ‘ कवि, इसके सिवा उपाय न दूजा जैसा पाओ पात्र, करो वैसी ही पूजा

दार्शनिक दलबदलू |काका हाथरसी Kaka Hathrasi

 आए जब दल बदल कर नेता नन्दूलालपत्रकार करने लगे, ऊल-जलूल सवालऊल-जलूल सवाल, आपने की दल-बदलीराजनीति क्या नहीं हो रही इससे गँदलीनेता बोले व्यर्थ समय मत नष्ट कीजिएजो बयान हम दें, ज्यों-का-त्यों छाप दीजिए
समझे नेता-नीति को, मिला न ऐसा पात्रमुझे जानने के लिए, पढ़िए दर्शन-शास्त्रपढ़िए दर्शन-शास्त्र, चराचर जितने प्राणीउनमें मैं हूँ, वे मुझमें, ज्ञानी-अज्ञानी मैं मशीन में, मैं श्रमिकों में, मैं मिल-मालिकमैं ही संसद, मैं ही मंत्री, मैं ही माइक


हरे रंग के लैंस का चश्मा लिया चढ़ायसूखा और अकाल में ‘हरी-क्रांति’ हो जाय’हरी-क्रांति’ हो जाय, भावना होगी जैसीउस प्राणी को प्रभु मूरत दीखेगी वैसीभेद-भाव के हमें नहीं भावें हथकंडेअपने लिए समान सभी धर्मों के झंडे
सत्य और सिद्धांत में, क्या रक्खा है तात ?उधर लुढ़क जाओ जिधर, देखो भरी परातदेखो भरी परात, अर्थ में रक्खो निष्ठाकर्तव्यों से ऊँचे हैं, पद और प्रतिष्ठाजो दल हुआ पुराना, उसको बदलो साथीदल की दलदल में, फँसकर मर जाता हाथी

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